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एचआईवी और एड्स से जुड़े मिथ, जिनका सच जानना जरूरी है...

हैरानी तो इस बात की है कि ज्यादातर लोग जो एचआईवी या एड्स में फर्क तक नहीं पता. तो चलिए सबसे पहले जानते हैं एचआईवी और एड्स में क्या फर्क है.

एचआईवी और एड्स से जुड़े मिथ, जिनका सच जानना जरूरी है...

AIDS Myths: शर्त बस यही है कि उनको लगातार उचित व सुझाया गया चिकित्सकीय इलाज कराते रहना चाहिए.

आम तौर पर एचवीआई के नाम से पुकारा जाने वाला ह्यूमन इम्यूनोडिफिसिएंसी वायरस एक ऐसा वायरस है, जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली पर हमला करता है और उसकी विभिन्न संक्रमणों से लड़ने की क्षमता को नष्ट कर देता है. जबकि एड्स (एक्वायर्ड इम्यूनो डिफिसिएंसी सिंड्रोम) एचआईवी का बाद वाला चरण है, जिसमें एचआईवी के चलते प्रतिरक्षा प्रणाली गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो जाती है. एड्स का निदान होते समय इम्यून सेल या सीडी4 सेल की संख्या दयनीय स्थिति (200 से भी कम) में पहुंच जाती है. अगर किसी संक्रमित व्यक्ति की हालत लगातार बिगड़ती रहे और वह एड्स के अगले चरण तक पहुंच जाए, तो उसे कुछ किस्म के कैंसर और ट्यूबरक्लोसिस हो सकते हैं तथा उसके फेफड़े/त्वचा/मस्तिष्क में भी संक्रमण फैल सकता है.

आम तौर पर यह गलत धारणा फैली हुई है कि एचआईवी तथा एड्स एक ही बीमारी है और एचआईवी से संक्रमित होने पर लोगों को एड्स हो ही जाएगा! जबकि सच्चाई यह है कि एचआईवी के संक्रमण से एड्स होना जरूरी नहीं होता. तथ्य तो यह है कि एचआईवी से संक्रमित अनेक लोग बिना एड्स के सालोंसाल जिंदा रहते हैं, शर्त बस यही है कि उनको लगातार उचित व सुझाया गया चिकित्सकीय इलाज कराते रहना चाहिए.

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वर्तमान में एचआईवी के लिए एआरटी (एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी) नामक इलाज सुझाया जाता है. यह एक बेहद प्रभावी थेरेपी है और खून में वायरस के स्तर को एकदम निचले स्तर पर ले आती है. इसका नतीजा यह होता है कि एचआईवी न तो संक्रमित व्यक्ति की दिनचर्या को प्रभावित कर पाता और न ही उसकी जिंदगी कम कर पाता है.

एचआईवी के साथ सामाजिक कलंक जैसी ढेरों चीजें भी जुड़ी हुई हैं, क्योंकि लोगों के बीच इस बीमारी से संबंधित जागरूकता और जानकारियों का नितांत अभाव है. एचआईवी से संक्रमित लोगों के साथ समाज अब भी बड़ा भेदभाव करता है और उन्हें कोई सहयोग नहीं देता है. एचआईवी से जुड़े सभी तथ्यों को जानना अत्यंत जरूरी है और इसके मरीजों को इलाज हासिल करने का भरपूर मौका दिया जाना चाहिए. 

एचआईवी और एड्स से जुड़े कुछ मिथ और तथ्य यहां पेश किए जा रहे हैं:

1) मिथ: अगर मैं एचआईवी पॉजिटिव हूं तो लंबी जिंदगी नहीं जी सकूंगा.

क्या है सच: उन्नत तकनीक और नैदानिक औजारों के सहारे सही समय पर बीमारी का पता लगने और सही इलाज कराने पर कोई भी एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति एक सामान्य, स्वस्थ और लंबी जिंदगी जी सकता है.

2) मिथ: किसी व्यक्ति को देख कर ही हम पहचान सकते हैं कि वह एचआईवी से संक्रमित है या नहीं.

क्या है सच: सिर्फ देख कर किसी व्यक्ति के बारे में यह जान लेना कि वह संक्रमित है या नहीं, मुमकिन नहीं है. जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है, अगर सही समय पर बीमारी का निदान करके उसका इलाज शुरू कर दिया जाए तो कोई भी संक्रमित व्यक्ति सामान्य जिंदगी जी सकता है. इसके अलावा कई बार एचआईवी का पता देर से ही लग पाता है. संक्रमित व्यक्ति में शुरुआती दौर में शायद ही इसके कभी कोई लक्षण दिखाई दें या फिर किसी भी अन्य बीमारी की तरह आम बुखार या बदन दर्द जैसे लक्षण ही उभर कर आएं.

3) मिथ: संक्रमित व्यक्ति को छूने से एचआईवी फैल सकता है.

क्या है सच: यह सत्य नहीं है. किसी संक्रमित व्यक्ति के साथ उठने-बैठने या खाना खाने भर से संक्रमण नहीं हो सकता.

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4) मिथ: अगर माता-पिता दोनों एचआईवी से संक्रमित हों तो उनकी संतान को भी यह संक्रमण हो जाएगा.

क्या है सच: सबसे पहली बात तो यह है कि एचआईवी कोई जेनेटिक डिसऑर्डर नहीं है. अपने माता-पिता के जींस के जरिए बच्चों में यह संक्रमण नहीं पहुंच सकता. हां, अगर कोई गर्भवती महिला एचआईवी से संक्रमित है, तो गर्भावस्था, डिलिवरी अथवा स्तनपान के दौरान उसकी संतान को संक्रमण होने की आशंका बनी रहती है. लेकिन जल्द निदान कर लेने पर इस आशंका को भी दूर किया जा सकता है. मेडिसिन के क्षेत्र में हुई तरक्की ने ऐसे किसी भी वायरस ट्रांसमीशन को न्यूनतम कर दिया है और यह ट्रांसमीशन दर 1% से भी कम है.

5) मिथ: एचआईवी से संक्रमित महिला को गर्भधारण नहीं करना चाहिए.

क्या है सच: चिकित्सकों के उचित परामर्श और उनकी देखरेख में गर्भधारण की योजना निश्चित ही बनाई जा सकती है.
 

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6) मिथ: अगर माता-पिता दोनों ही एचआईवी से संक्रमित हो चुके हैं, तो शारीरिक संसर्ग के दौरान उन्हें सुरक्षा का कोई साधन अपनाने की जरूरत नहीं है. 

क्या है सच: यहां दो बातें ध्यान रखना जरूरी हैं- पहली बात तो यह है कि एचआईवी के भी भिन्न प्रकार होते हैं. मुमकिन है कि दोनों पार्टनर अलग - अलग प्रकार के एचआईवी से संक्रमित हों. दूसरी बात यह है कि दोनों पार्टनर के शरीर में वाइरस की मात्रा (वायरल लोड) अलग - अलग हो सकती है. इसलिए शारीरिक संपर्क के दौरान उन्हें निश्चित तौर पर कंडोम (गर्भनिरोधक) का इस्तेमाल करना चाहिए. कंडोम लोगों को अन्य यौन रोगों से भी बचाते हैं. 

7) मिथ: एचआईवी से संक्रमित लोग व्यायाम नहीं कर सकते.

क्या है सच: एक स्वस्थ जीवनशैली के लिए उन्हें व्यायाम करना ही चाहिए.

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8) मिथ: एचआईवी केवल यौन-संबंध स्थापित करने पर ही ट्रांसमिट हो सकता है.

क्या है सच: अगर कोई व्यक्ति, एचआईवी से संक्रमित व्यक्ति की सुइयां और सिरिंज, किसी कारणवश (जैसे नशे, दवा इतियादि) इस्तेमाल कर लेता है तो उसको भी यह संक्रमण हो सकता है. टैटू (गोदना) बनवाते समय अगर किसी संक्रमित व्यक्ति की सुई का इस्तेमाल किया जाता है, तो वह संक्रमण का जरिया बन सकती है.

किसी संक्रमित व्यक्ति का खून चढ़ाने से भी एचआईवी ट्रांसमिट हो सकता है. हालांकि खून की समुचित निगरानी करने से अधिकतर जगहों पर ऐसे मामले ना के बराबर हो गए हैं. 

एक अन्य संभावना यह भी है कि शिशु को यह संक्रमण गर्भावस्था, डिलिवरी अथवा स्तनपान के दौरान उसकी संक्रमित मां से भी मिल सकता है. 

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9) मिथ: अगर कोई व्यक्ति एचआईवी से संक्रमित है, तो उसे एड्स है.

क्या है सच: सबसे पहले आपको यह समझना होगा कि एचआईवी एक वायरस है. जब किसी को एचआईवी वायरस लग जाता है, तो हम कह सकते हैं कि उसे एचआईवी की बीमारी है. एचआईवी वायरस हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को क्षतिग्रस्त करता है तथा हमारे शरीर की किसी संक्रमण का प्रतिरोध या उसका मुकाबला करने वाली क्षमता को नष्ट कर देता है. ऐसे में अगर किसी की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर है, तो उसे टीबी, लंग इंफेक्शन, स्किन इंफेक्शन या कैंसर जैसे अनेक संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाता है, जो हमारे शरीर को तेजी से नुकसान पहुंचा सकते है | इस अवस्था को ही एड्स कहा जाता है.

10) मिथ: एचआईवी से संक्रमित व्यक्ति को एड्स होकर रहेगा.

क्या है सच: उचित इलाज के सहारे एचआईवी का एड्स में तब्दील होना लंबे समय तक रोका जा सकता है. किसी व्यक्ति को एचआईवी संक्रमण का पता लगते ही किसी लोकलाज या भय के बिना इलाज शुरू कर देना चाहिए. आपको पता होना चाहिए कि बीमारी और इलाज से सम्बंधित मरीज की जानकारी चिकित्सालयों में गोपनीय रखी जाती है. एचआईवी का इलाज बिल्कुल मुमकिन है और लोग एचआईवी संक्रमित व्यक्ति के साथ पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर व्यवहार न करें, न ही उन्हें कलंकित व्यक्ति समझें. समाज को चाहिए कि वह ऐसे मरीजों को सामान्य जिंदगी जीने दे. इसके साथ-साथ यह भी जरूरी है कि संक्रमित व्यक्ति भयभीत न हों और अपनी हालत को हरगिज न छिपाएं. उन्हें इस बीमारी के बारे में प्रत्येक जानकारी हासिल करनी चाहिए.

(डॉ. रेशू अग्रवाल, कंसल्टेंट: इंटरनल मेडिसिन, मणिपाल हॉस्पिटल्स, व्हाइटफील्ड, बैंगलुरु)


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अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.

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